खालसा पंथ की स्थापना सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंघ द्वारा 16 मार्च सन 1699 में अनंदपुर साहिब (पंजाब ) में की थी। जिसे खालसा सिरजना दिवस भी कहा जाता है।
भारत में औरंगजेब का शासन था, उस समय कोई भी व्यक्ति अपने पास किसी भी प्रकार का अस्त्र-शस्त्र धारण नही कर सकता था। जिस भी व्यक्ति के पास छुरी-चाकू मिल जाता था, तब वह उसे बडी बेरहमी से उसका कत्ल कर देता जिससे लोगो में खोफ पैदा होने लगा था। औरंगजेब एक दिन में हिंदुओं के सवा सौ मण जनेऊ उतारता और उन्हे मुस्लिम धर्म कबुल करवाता था। जिससे हिंदू धर्म लुप्त होने लगा। तब गुरू गोबिंद सिंघ ने मानवता की रक्षा के लिए अपने सिखों को आदेश दिया कि जहां कहां भी सिख मिले उन्हे अनंदपुर साहिब के किले पर एकत्रित करें। अनंदपुर साहिब के किले पर लगभग हजारों लोग एकत्रित हुए। उस समय गुरु गोबिंद सिंघ ने भीड के सामने खडे होकर पांच सिरों की मांग की। जिससे भारी भीड में अहाकार मच गया। भीड कुछ समय बाद शांत हुई। उसी समय कुछ सिखो ने गुरु गोबिंद सिंघ जी की माता गुजरी जी से शिकायत की तब वह भी उस भीड में आकर गुरु गोबिंद सिंघ की बातें सुनने लगी। गुरु गोबिंद सिंघ ने पांच सिरों की मांग की। इसी तरह उन्होने पांच बार कहा.....
उस भीड में से एक सिख खडा हुआ गुरु गोबिंद सिंघ ने उसे स्टेज पर बुलाया और उसे बांह से पकड कर एक तम्बू में ले गये। गुुरु गोबिंद सिंघ कुछ समय बाद तम्बू से बाहर आयेे। गुरु गोबिंद सिंघ ने दूसरे सिर की मांग की उसे भी तम्बू में ले गये और कुछ समय बाद बाहर आये। इसी तरह वह पोंचों सिखें को तम्बू में ले गये। और कुछ समय बाद उन पांचों लोगोे को खण्डे की पाहुल देकर, सिंघ सजाकर और पांच ककार धारण करवा कर जिसमें केश, कंघा, कडा, कृपान, और कछहरा पेहनारक तम्बू से बाहर ले आये। वहां बैठे लोग उन्हे देख कर हैरान होने लगे। उन लोगो में जान डालने के लिए गुरु गोबिंद सिंघ ने खण्डे की पाहुल देकर सिंघ सजाया। और औरंगजेब के शासन के विरुद्ध लडने के लिए प्रेरित किया। जो व्यक्ति उस समय अपने पास छूरी-चाकू नही रख सकता था गुरु गोबिंद सिंघ ने उन लागो को पाहुल देकर सिंघ सजाया । और अपने पास हमेशा- हमेशा के लिए अस्त्र -शस्त्र रखने के लिए कहा....
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